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“मेरे विचार अध्याय 1: मेरा परिचय और जीवन दृष्टिकोण  जितेन्द्र गौतम”

जीवन का अनुभव ही सच्चा ज्ञान है

मेरा नाम जितेन्द्र गौतम है। मेरी आयु 53 वर्ष है। मेरी पत्नी का नाम सविता गौतम है। हमारे दो बच्चे हैं—बड़ा बेटा सुनिश्चित गौतम और बेटी चेष्टा गौतम। यह परिवार मेरे जीवन का आधार है, और इनके साथ बिताया हर क्षण मुझे जीवन के नए अर्थ समझाता है।

मैंने जीवन के इन 53 वर्षों में एक बात बहुत गहराई से सीखी है—इंसान को वही ज्ञान दूसरों के साथ बांटना चाहिए, जिसे उसने स्वयं अनुभव किया हो और जिसे उसने अपने जीवन में उतारा हो। केवल किताबों से पढ़ी बातें या इंटरनेट पर देखी-सुनी जानकारियों को बिना अनुभव के साझा करना मेरे अनुसार उचित नहीं है।

किताबों का ज्ञान और जीवन का सत्य

आजकल हम देखते हैं कि कई लोग बड़े-बड़े ग्रंथों का हवाला देते हैं। उदाहरण के तौर पर, कोई गीता पढ़ लेता है और तुरंत ही लोगों को उपदेश देने लग जाता है—“माया के पीछे मत भागो, सब यही रह जाएगा।” मैं यह बात इस रूप में कहने का साहस नहीं कर सकता, क्योंकि मेरा अपना जीवन इससे अलग है।

मैं स्वयं दिन में 12 से 14 घंटे मेहनत करता हूँ। इस मेहनत के बदले में मुझे पैसा मिलता है, जो मेरे और मेरे परिवार के लिए आवश्यक है। क्या यह माया के पीछे भागना है? या यह जीवन के कर्तव्य को निभाना है? मैं कहूँगा कि यह दोनों का संतुलन है। हाँ, यह अलग बात है कि इस मेहनत में मुझे एक तरह का सुकून भी मिलता है, जो मेरे लिए बोनस के समान है।

लेकिन यह भी सच है कि कई बार मैं छुट्टी नहीं लेता, सिर्फ इसलिए कि मुझे चिंता होती है कि वेतन कट जाएगा। यह चिंता और मेहनत दोनों मेरे जीवन का हिस्सा हैं। ऐसे में यदि मैं यह कहूँ कि “माया का कोई महत्व नहीं है,” तो क्या यह मेरी सच्चाई होगी? नहीं। इसलिए मैं दूसरों को भी ऐसा कहने से बचता हूँ।

अनुभव का ज्ञान ही स्थायी है

मेरा यह मानना है कि यदि किसी ने गीता पढ़ी है और वह उसके अनुसार जीने भी लगा है, तो उसे दूसरों को उपदेश देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। लोग स्वयं उसके जीवन को देखकर प्रेरित होंगे और उसके पास ज्ञान प्राप्त करने आएँगे।

ज्ञान बांटने से पहले हमें यह देखना चाहिए कि क्या हमने स्वयं उस ज्ञान को अपनाया है? केवल सुनाई-सुनाई बातों को दोहराना न तो हमें संतोष देगा और न ही सामने वाले को वास्तविक मार्गदर्शन।

सीखते रहना ही जीवन है

मैंने चौथी कक्षा में पढ़ते समय से ही संगीत में रुचि लेना शुरू कर दिया था। वह एक छोटा सा बीज था, जो समय के साथ अंकुरित हुआ, फिर वृक्ष बना और अब भी उसमें नए पत्ते निकल रहे हैं। आज 53 वर्ष की आयु में भी मैं सीख रहा हूँ।

संगीत में मेरी यात्रा केवल राग-रागिनियों और तालों तक सीमित नहीं रही। मैंने सीखा कि संगीत धैर्य सिखाता है, विनम्र बनाता है और सबसे बढ़कर हमें अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है। यह मेरे जीवन का ऐसा हिस्सा है, जिसे मैं हर दिन जीता हूँ। और मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे ही दूसरों के साथ साझा करता हूँ—ना कि किताबों या दूसरों के अनुभवों की नकल।

सीखने और सिखाने का सही तरीका

मेरे अनुसार, यदि आप किसी को कुछ सिखाना चाहते हैं, तो पहले स्वयं उसकी गहराई तक जाएँ। आपके अपने अनुभव ही आपकी सबसे बड़ी पूँजी हैं। जब आप उन अनुभवों से गुज़रते हैं, तो आपके शब्दों में वह सच्चाई और वजन अपने आप आ जाता है, जिसे कोई किताब नहीं दे सकती।

और जो लोग ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं, उन्हें भी यह देखना चाहिए कि सामने वाला जो बता रहा है, क्या उसने स्वयं वह रास्ता चला है? या केवल पढ़ा और सुना है? यह सवाल करना आवश्यक है, ताकि हम अधकचरे ज्ञान के जाल में न फँसें।

निष्कर्ष

जीवन का हर दिन हमें कुछ न कुछ सिखाता है। मैं यही मानता हूँ कि जो कुछ सीखा है, वही बाँटो। अपने अनुभवों को दूसरों के साथ साझा करो। इससे न केवल सामने वाले का भला होगा, बल्कि आपको भी संतोष मिलेगा कि आप वास्तविक और सच्चा योगदान दे रहे हैं।




अध्याय 2 में

अगले अध्याय में हम संगीत पर चर्चा करेंगे—जितना मैंने स्वयं अनुभव किया और सीखा है, उसी के आधार पर।

— जितेन्द्र गौतम 

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